
योग-दर्शन तथा साधना की हिन्दी पत्रिका
योगापीस संस्थान · जयपुर
योग के विषय में आज अनेक स्वर तथा अगणित दावे प्रचलित हैं। ऐसे समय में योग आनंदम् का एकमात्र प्रयोजन है —
योग-विद्या को उसके मूल, प्रामाणिक तथा सम्पूर्ण रूप में आप तक पहुँचाना।
“योग आनंदम् शिक्षा का माध्यम है, खण्डन का नहीं।”
प्रथम
योग — पूर्ण लक्ष्य
योग यहाँ देह-साधन मात्र नहीं, अपितु अपने पूर्ण लक्ष्य — चित्त-वृत्ति-निरोध तथा स्वरूप-प्रतिष्ठा — के रूप में निरूपित होता है।
द्वितीय
स्वास्थ्य — सहज उपलक्ष्य
स्वास्थ्य योग का स्वाभाविक उपलक्ष्य है, साध्य नहीं। साधना के परिपाक के साथ वह स्वयं प्रकट होता है।
तृतीय
भारतीय दर्शन — स्वतंत्र प्रामाणिकता
सांख्य, योग, वेदान्त तथा अन्य परम्पराएँ अपनी स्वतंत्र प्रामाणिकता में। शास्त्र, ऋषि-वचन तथा अनुभव स्वयं प्रमाण हैं।
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