योग आनंदम् का जन्म एक सरल किन्तु गम्भीर संकल्प से हुआ — कि योग-विद्या अपने मूल, प्रामाणिक तथा सम्पूर्ण रूप में पाठक तक पहुँचे।
आज जब योग के विषय में अनेक प्रकार की धारणाएँ, परस्पर-विरोधी मत तथा अगणित दावे प्रचलित हैं, तब साधक के समक्ष सबसे बड़ी आवश्यकता विवेक की है — यह पहचानने की कि कौन-सा कथन शास्त्र-संगत है, कौन-सा अनुभव-सिद्ध, और कौन-सा केवल आभास। इस पत्रिका का अभिप्राय किसी की ओर अंगुली उठाना नहीं, अपितु प्रकाश रखना है — इस विश्वास के साथ कि प्रामाणिक विद्या स्वयं अपने तेज से भ्रम का निवारण कर देती है।
योग यहाँ देह-साधन अथवा आरोग्य-उपाय मात्र के रूप में नहीं, अपितु अपने पूर्ण लक्ष्य — चित्त-वृत्ति-निरोध तथा स्वरूप-प्रतिष्ठा — के रूप में निरूपित होता है। स्वास्थ्य इसका सहज उपलक्ष्य है, साध्य नहीं।
इसके साथ ही पत्रिका का एक मुख्य प्रयोजन यह भी है कि हमारी भारतीय दर्शन-परम्पराएँ — सांख्य, योग, वेदान्त, तथा अन्य — पाठक के समक्ष अपनी स्वतंत्र प्रामाणिकता में आएँ। उन्हें किसी बाह्य प्रमाण की पुष्टि की आवश्यकता नहीं, क्योंकि शास्त्र, ऋषि-वचन तथा अनुभव — ये स्वयं प्रमाण हैं।
संक्षेप में — योग आनंदम् शिक्षा का माध्यम है, खण्डन का नहीं। हमारा मार्ग सकारात्मक निरूपण है : प्रामाणिक को इतनी स्पष्टता से प्रस्तुत करना कि विवेकी पाठक स्वयं सत्य की ओर अग्रसर हो।